Rating: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)
निर्देशक: अभिनय देव
कलाकार: प्लाबिता बोरठाकुर, अंकुर विकल, समीधा गुरु, त्विशा जोशी और कृष्णा गोकानी
संगीत: राम संपत
अवधि: 1 घंटा 18 मिनट
क्रिकेट देखने वालों को साल 2002 का लॉर्ड्स वाला वो पल जरूर याद होगा, जब नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतने के बाद सौरव गांगुली ने बालकनी में अपनी टी-शर्ट उतारकर लहराई थी। उस समय यह सिर्फ एक जीत का जश्न नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट के बदले हुए अंदाज और आत्मविश्वास की पहचान भी बन गया था।
फिल्म ‘दूसरा’ इसी ऐतिहासिक पल को एक लड़की की जिंदगी से जोड़ती है। फिल्म की कहानी क्रिकेट से ज्यादा एक लड़की की आजादी, उसके सपनों और परिवार की बंदिशों के बारे में है।
निर्देशक अभिनय देव ने इस कहानी को अलग तरीके से पेश करने की कोशिश की है। फिल्म छोटी जरूर है, लेकिन इसका विषय सोचने पर मजबूर करता है।
कहानी: एक लड़की के सपनों की लड़ाई
फिल्म की कहानी तारा नाम की लड़की की है, जो राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में रहती है। उसके परिवार में लड़कियों के लिए कई नियम हैं। क्या पहनना है, कैसे रहना है और जिंदगी के फैसले कैसे लेने हैं, इन सब पर परिवार की सोच का असर दिखाई देता है।
तारा भी अपने सपने पूरे करना चाहती है और अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती है। लेकिन उसके लिए यह इतना आसान नहीं है।
इसी बीच भारत 2002 में इंग्लैंड को हराकर नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतता है। सौरव गांगुली का लॉर्ड्स की बालकनी में टी-शर्ट लहराने वाला अंदाज तारा को भी कहीं न कहीं हिम्मत देता है।
यहीं से फिल्म की कहानी दिलचस्प हो जाती है। जिस तरह भारतीय टीम ने मैदान पर जीत हासिल की, उसी तरह तारा भी अपनी जिंदगी में अपने लिए खड़े होने की कोशिश करती है।
मुझे फिल्म का यह विचार अच्छा लगा कि कभी-कभी कोई ऐसा पल, जिससे हमारा सीधा कोई संबंध नहीं होता, वह भी हमें अपनी जिंदगी बदलने की प्रेरणा दे सकता है।
अभिनय और निर्देशन कैसा है?
फिल्म में प्लाबिता बोरठाकुर ने तारा का किरदार अच्छे तरीके से निभाया है। उनकी एक्टिंग में बनावटीपन कम नजर आता है। एक ऐसी लड़की, जो अपने परिवार से प्यार भी करती है, लेकिन अपनी आजादी भी चाहती है, उसकी उलझन और बेचैनी को उन्होंने अच्छी तरह दिखाया है।
अंकुर विकल ने तारा के पिता की भूमिका निभाई है। उनका किरदार भी दिलचस्प है, क्योंकि वह अपनी बेटी से प्यार तो करता है, लेकिन पुरानी सोच और सामाजिक मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाता।
बाकी कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाएं ठीक तरह से निभाई हैं।
निर्देशक अभिनय देव की कोशिश अच्छी है। उन्होंने क्रिकेट की एक ऐतिहासिक घटना को सिर्फ दोबारा दिखाने के बजाय उसे एक लड़की की जिंदगी से जोड़ने का प्रयास किया है। फिल्म में पुराने क्रिकेट फुटेज का इस्तेमाल भी अच्छा लगता है।
हालांकि, मुझे लगता है कि तारा के संघर्ष को थोड़ा और विस्तार दिया जाता, तो कहानी दर्शकों से बेहतर तरीके से जुड़ सकती थी।
रिलीज से पहले विवाद में क्यों आई ‘दूसरा’?
फिल्म की चर्चा सिर्फ इसकी कहानी की वजह से नहीं हुई। रिलीज से पहले पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने फिल्म के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।
विवाद इस बात को लेकर था कि फिल्म में उनकी पहचान और 2002 के ऐतिहासिक लॉर्ड्स सेलिब्रेशन का इस्तेमाल उचित अनुमति के बिना किया गया है या नहीं।
गांगुली की ओर से फिल्म की रिलीज रोकने की मांग की गई थी। हालांकि, 22 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म की 23 अक्टूबर को होने वाली रिलीज पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया।
फिल्म निर्माताओं का कहना था कि यह सौरव गांगुली की बायोपिक नहीं है, बल्कि एक लड़की की कहानी है, जिसे क्रिकेट के उस ऐतिहासिक पल से प्रेरणा मिलती है।
इस मामले में रिलीज के समय तक कानूनी विवाद का अंतिम फैसला नहीं हुआ था। इस विवाद ने फिल्म को रिलीज से पहले ही चर्चा में ला दिया।
संगीत और फिल्म का बाकी हिस्सा
राम संपत का संगीत फिल्म के माहौल के हिसाब से ठीक बैठता है। पुराने क्रिकेट फुटेज देखकर 2002 की उस ऐतिहासिक जीत की यादें ताजा हो जाती हैं।
फिल्म की अवधि करीब 78 मिनट है, इसलिए इसे देखने में ज्यादा समय नहीं लगता। हालांकि, कुछ हिस्सों में कहानी थोड़ी और मजबूत हो सकती थी।
आखिर फिल्म देखनी चाहिए या नहीं?
मेरे हिसाब से ‘दूसरा’ एक अलग तरह की फिल्म है। इसमें क्रिकेट जरूर है, लेकिन यह क्रिकेट मैच या सौरव गांगुली की जिंदगी की कहानी नहीं है। इसका असली मुद्दा एक लड़की की आजादी और अपने फैसले खुद लेने की हिम्मत है।
फिल्म की सबसे अच्छी बात इसका विचार और प्लाबिता बोरठाकुर का अभिनय है। अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं, जिनमें मनोरंजन के साथ कोई सामाजिक बात भी कही जाती है, तो इसे देख सकते हैं।
हां, अगर आप क्रिकेट से जुड़ी बहुत सारी रोमांचक घटनाओं या तेज रफ्तार कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो शायद यह फिल्म आपको थोड़ी धीमी लगे।
कुल मिलाकर: ‘दूसरा’ एक अच्छी कोशिश है। इसकी कहानी और संदेश अच्छे हैं, हालांकि इसे थोड़ा और बेहतर बनाया जा सकता था। फिल्म की एक बात जरूर याद रह जाती है—जीत सिर्फ मैदान पर नहीं होती, कभी-कभी अपनी जिंदगी के लिए आवाज उठाना भी एक बड़ी जीत होती है।
मेरी रेटिंग: 3.5/5 स्टार।
